बिना माँ के बड़ी होने वाली लड़कियाँ
बिना माँ के बड़ी होने वाली लड़कियाँ

इतने 
कठोर शीर्षक का मैं 
विरोध करता हूँ 
लेकिन 
इसे शायद ऐसा ही होना है 
क्योंकि ये जीवन है कितनी ही लड़कियों का 
जिन्हें बड़ा होना होता है 
बिना किसी सहारे 
ख़ुद के ही दम पर 
पार पाना होता है दुनिया से 
और ख़ुद से भी 

उनके कुछ शुरुआती क़दमों तक 
वे माएँ उनके साथ रही 
फिर खो गईं 
किसी ऐसे बहुत बड़े अँधेरे में 
जिसे पारिभाषिक रूप से हम मृत्यु भी कह सकते हैं 
वे छोड़ गई पीछे 
अपनी ही कोख से जन्मे 
डगमगाते पाँव 
जिन्हें धरती को इस्तेमाल करना भी नहीं आता था 

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वे छोड़ गईं उन्हें 
जैसे अचानक ही तेज़ हवा चलने पर 
आँगन में 
अधूरी छोड़नी पड़ जाती है 
कोई रंगोली 

जो पीछे रह गईं वे कुछ कोंपलें थी 
धूप और हवा में हिलती हुई पूरे उत्साह से 
हर किसी को लुभाती 
कभी-कभी तो अचानक ही उन्हें चरने चले आते 
मवेशी 
अपना मजबूत जबड़ा हिलाते 

वे भय से काँप कर 
अपने आपसपास की बड़ी पत्तियों के पीछे 
सिमट जातीं 

अपने पहले स्राव से घबराई 
दौड़ती जातीं 
पड़ोस की किसी बुआ या चाची के घर 
मदद के वास्ते 
तो ऐलान हो जाता 
मुहल्ले भर की औरतों में ही 
कि बड़ी हो गईं हैं अब अमुक घर की बछेड़ियाँ भरपूर 
और उनके पीछे तो कोई लगाम भी नहीं 

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क्या वे सिर्फ लगाम ही बन सकती थीं 
जो चली गईं 
असमय ही छोड़कर 
और जो बची रहीं वे भी आख़िर क्या बन पाईं? 

बहुत कठोर लेकिन आसान है यह कल्पना 
एक दिन 
ये लड़कियाँ भी माँ बनेंगी 
और उसी राह चलेंगी 
दुनिया में रहते या न रहते हुए भी 
बहुत अलग नहीं होगा इनका भी जीवन 

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इतने कठोर अंत का भी 
मैं विरोध करता हूँ 
लेकिन इस प्रार्थना के साथ – 

मेरी कविता में उजाला बनकर आएँ 
वे हमेशा 
वैसी ही खिलखिलाती 
शरारती 
और बदनाम 

और मैं उजागर करता रहूँ जीवन 
उनके लिए 
लेकिन 
अपनी किसी अनहुई बेटी की तरह 
हमेशा ही 
दिल की गहराइयों में कहीं 
सोचकर रखूँ 
उनके लिए एक नाम! 

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