अखबार | ब्रिज नाथ श्रीवास्तव
अखबार | ब्रिज नाथ श्रीवास्तव

अखबार | ब्रिज नाथ श्रीवास्तव

अखबार | ब्रिज नाथ श्रीवास्तव

सुबह-सुबह ही
हाल-चाल सब
बता गया अखबार।

उजले चेहरों द्वारा
छाया का रेप हुआ
दूरभाष अनचाहे
लोगों का टेप हुआ

धर्म-जाति की
गणना में ही
मस्त हुआ दरबार।

पेंशन की दौड़ धूप में
बुधिया वृद्ध हुई
बढ़ता बोझ करो का
सरकारें गिद्ध हुईं।

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अनशन करते
लोग झेलते
मँहगाई की मार।

मरा दिखाकर घर से
बेदखल हुआ होरी
लखपति के घर डाका
लिखी रपट में चोरी

जोड़-तोड़ के
करतब से कब
मुक्त हुई सरकार।

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