जब से तुम को देखा है
बस फूल-फूल है आँखों में।

खुशबू लिखती जाने कब से
पंखुड़ियों में बंद कथाएँ
हिरनी की आँखों की खुशियाँ
जंगल के मन को गमकाए
अब उड़ान ने भाषा पहनी
है चिड़िया की पांखों में।

हवा बदलने को जागी हैं
पेड़ों की तांबई कोंपलें
एक गीत गाने का मन है
हवा अभी से जिधर को चले
दिन सतरंगे सपनों वाले
देखे बंद सलाखों में।

See also  देह का निर्गुण और सगुण | पुष्पिता अवस्थी

मंदिर के कलशों पर धीरे-
धीरे उतर रही किरनें
जीवन बदल रहा है जैसे
धूप लगी कविता लिखने
मौसम ने हरियाली दे दी
पत्तोंवाली शाखों में।